Sunday, January 15, 2012

अब तो ये नूंहए चाल्‍लेगी

 

ब्‍लॉग लिखना नहीं वरना ब्‍लॉग पढ़ना भी कम हुआ है। आज रवीश की एक कवितानुमा पोस्‍ट देखी तो मन में सवाल भर्राया कि भले आदमी आनलाइन दुनिया में इतना समय खपाने और बहुल उपस्थिति को साधें कैसें ? अगर ट्विटर, फेबु, ब्‍लॉग, प्‍लस वगैरह के साथ ईमानदारी से रहें और घर, परिवार, नौकरी में भी बेईमान न हों तो ये बुहत मुश्कि‍ल हो जाएगा। सवाल केवल समय का नहीं है, मास्‍टर कोई सबसे व्‍यस्‍त जीव तो है नहीं पर मामला दिमागी तौर पर जुड़ाव का भी है। खैर फिलहाल हम ईमानदारी को टाल रहे हैं, डिसक्‍लेमर ये है कि भले ही रिश्‍वत उश्‍वत की कोनो गुंजाइश हमारे धंधे में नहीं है पर हम साफ बता दे रहे हैं कि सोचने, लिखने व नौकरी पीटने, घर गिरस्‍ती संभालने के मामले में हम पूरी तरह से ईमानदारी से सक्रिय नहीं हैं। कुल मिलाकर अपना नएसाला प्रण ये है कि लिखेंगे मन की, अगर वो 140 अक्षरों में हुआ तो ट्विटर पर ठेलेंगे...थोड़ा ज्‍यादा हुआ तो फेसबुक पर... कुछ और ज्‍यादा तो ब्‍लॉग पर। अब तो ये नूंहए चाल्‍लेगी। 

Monday, July 11, 2011

लद्दाख यात्रा

अरसे बाद पोस्‍ट लिखी जा रही है, ब्‍लॉग पढ़ना भी कुछ कम हो रहा है... क्‍यों? कई बहाने बनाए जा सकते हैं पर हम मास्‍टरों की दिक्‍कत ये है कि वे लाख बहाने बनाएं पर दुनिया का सबसे चालू बहाना उनसे मुँह मोड़े रहता है... वे कह सकते हैं कंप्‍यूटर खराब है, बीमार हैं, इंटरनेट नहीं चल रहा... आदि आदि। पर वे ये नहीं कह सकते कि समय नहीं मिला, व्‍यस्‍त था। मास्‍टर और व्‍यस्‍त... कौन मानेगा, खुद समय आकर गवाही देगा...मैं समय हूँ..हर मास्टर के पास मैं बहुतायत में हूँ... जो मास्‍टर कहे मेरे पास समय नहीं है...वो झूठ बोलता है... उसने अपने विद्यार्थियों से अच्‍छे बहाने बनाना तक नहीं सीखा, उस पर विश्‍वास न करो। तो भैया हम बीमार थे (झूठ), हमारे कंप्‍यूटर खराब थे (झूठ), हमारे ब्राडबैंड का भट्टा बैठ गया था (झूठ)... पर हमारे पास समय की कमी नहीं थी (सच)। एक और सच ये भी है कि हम नहीं लिख रहे थे क्‍योंकि हमें पता है सदैव पता था कि मेरे-उसके- किसीके लिखने न लिखने दुनिया थमती नहीं है। तो आज मन किया इसलिए लिख रहे हैं :)

समय की अधिकता के कई साइड इफेक्‍ट्स में से एक ये भी है कि हम यात्रा खूब करते हैं। जबसे ब्‍लॉग लिखने में विराम आया तब से कई यात्राएं की हैं...हिमाचल में अलग अलग यात्राओं में सिरमौर क्षेत्र, डलहौजी, धर्मशाला, मैक्‍लाडगंज, मनाली, रेवलसार आदि जाना हुआ। बीच में काम से जुड़ी एक यात्रा में अहमदाबाद भी जाना हुआ जहॉ बेहद सौम्‍य संजय बेंगाणी भाई से भी एक संक्षिप्‍त मूलाकात हुई।  जिस यात्रा की बात मैं आज करना चाह रहा हूँ वह इनसे अलग हाल की हमारी लद्दाख यात्रा है। पिछले दिनों यानि 12 से 21 जून 2011 को हम भारत के 'अभिन्‍न अंग' कश्‍मीर राज्‍य में थे... तीन दिन घाटी के सुंदर इलाकों..गुलमर्ग, पहलगाम तथा श्रीनगर में बिताने के बाद हम उड़ चले लेह की ओर। श्रीनगर से लेह की हवाई यात्रा मात्र 30 मिनट की थी किंतु ये एक दुनिया से बिल्‍कुल भिन्‍न दुनिया में पहुँचने जैसा था... बहुत कम लोग पर्यटन के लिए लेह-लद्दाख पहुँचते हैं उनमें भी भारतीय पर्यटक और कम होते हैं...दरअसल कुछ साल पहले तक भारतीय पर्यटक विदेशी पर्यटकों की तुलना में चौथाई भी नहीं होते थे..राजग सरकार के विवादास्‍पद सिंधु-उत्‍सव के आयोजन के बाद से लद्दाख भारतीय स्‍थानीय पर्यटन के नक्‍शे पर आया है और पिछले तीन चार साल से भारतीय पर्यटकों की संख्‍या विदेशियों से अधिक हुई है। लोग अक्‍सर दिल्‍ली से सीधे लेह की फ्लाइट लेते हैं या कुछ लोग श्रीनगर से सड़क मार्ग से लेह जाना पसंद करते हैं जिसमें वे जोजिला दर्रे व कारगिल के खूबसूरत रास्‍ते से लेह पहुँचते हैं। ये रास्‍ता दो दिन में पूरा होता है जिसमें मार्ग में कारगिल में रुकना पड़ता है। सर्दियों में रास्‍ता बंद हो जाता है। हमारी योजना भी इसी रास्‍ते से जाने की थी पर श्रीनगर-लेह की टिकट सस्‍ती मिल जाने तथा इससे दो दिन बचने से ये कुल मिलाकर सड़क मार्ग की तुलना में सस्‍ती पड़ रही थी फिर बच्‍चों के आराम को ध्‍यान में रखते हुए हवाई मार्ग से ही लेह जाने का निर्णय लिया।

लद्दाख में हम कुल सात दिन रहे। पहले दो दिन समुद्रतल से दस हजार से ज्‍यादा ऊंचाई पर होने के कारण कम आक्‍सीजन में अभ्यस्‍त होने के लिए लेह में ही रहे... पहले दिन आराम किया तथा दूसरे दिन लेह का स्‍थानीय भ्रमण किया जिसमें हेमिस तथा थिक्‍से की बुद्ध विहार तथा सिंधु नदी का दर्शन प्रमुख था। दरअसल लद्दाख में हर मोड़, भू आकृति इतनी भिन्‍न इतनी खूबसूरत है कि लद्दाख को टूरिस्‍ट प्‍वाइंटों में बांटकर उसे मार्केट करने की रणनीति मुझे मूर्खता लगती है...अपनी भू आकृति में अपेक्षाकृत बंजरता भी इतनी सुंदर हो सकती है इसे केवल महसूस ही कर सकते हैं। मैं और नीलिमा दोनो ही भाषा के व्‍यक्ति हैं पर पहँचते ही समझ गए कि इस सौंदर्य का वर्णन करने का प्रयास भाषा की क्षमता को बढ़ाकर आंकना है। कश्‍मीर बेहद सुंदर है...उसे धरती का स्‍वर्ग कहा जाता...ठीक है किंतु लद्दाख...इसे कुछ कहा नहीं जा सकता यह कहे जाने के परे है। ये चहकने पर नहीं मौन पर विवश करता है।

अगल दो दिन हमने नुबरा-घाटी कहे जाने वाले लद्दाख क्षेत्र में बिताए। हुंडर गांव में लगाए गए कैंप में हम रूके। ये वह क्षेत्र है जो मेरी अब तक देखी गई भूआकृतियों में सबसे हैरान करने वाला रहा। सबसे पहले तो यहॉं पहुँचने के लिए खार्दुंग ला नाम के दर्रे से गुजरना होता है दुनिया का सबसे ऊंचा मोटरमार्ग वाला दर्रा है 18000 फीट से अधिक ऊंचाई पर आक्‍सीजन बेहद कम हो जाती है तथा अक्‍सर यात्रियों की तबियत बिगड़ जाती है... वहॉं अधिक देर न रुकने की सलाह दी जाती है। इसके बाद उतरकर हम पहुँचते हैं नुबरा नदी क्षेत्र में जो इस बर्फीली दुनिया में बाकायदा एक रेगिस्तान है जिसमें बालू के दूर दूर तक बिखरे टिब्‍बे हैं जिनपर बाकायदा ऊंटों की सवारी होती है। यानि एक ही भूआकृति में बर्फीले पहाड़, नदी, और रेगिस्तान है... आप कुदरत की रचना पर बस हैरान हो सकते हैं।

नुबरा से लौटकर अगल दो दिन बेहद खूबसूरत पांन्‍गांग झील की यात्रा में बिताए। थ्री ईडियट फिल्‍म में लोकेशन के तौर पर इस्‍तेमाल होने के कारण लोकप्रिय हुई यह विशालकाय झील दुनिया की सबसे ऊंची खारे पानी की झील है। झील का तीन चौथाई हिस्‍सा चीन तथा एक चौथाई भारत के पास है। पानी इतना खारा है कि झील में मछली तक नहीं रह पाती। ये झील निश्चित तौर प्राकृतिक सौंदर्य की खान है... आंखें खुद ब खुद झुक जाती हैं मानों हार स्‍वीकार कर रही हों कि इतना सौंदर्य खुद में समा सकें इतना बूता नहीं हैं। फिर से एक मौन।

ऊपर लिखे शब्‍दों को यात्रा वृतांत न माना जाए...लद्दाख अवर्णनीय है। ये शब्‍द तो केवल सनद हैं कि हम वहॉं थे। एक अंजुलि चित्र, यदि कभी दुस्‍साहस कर पाया तो विस्‍तार से इस यात्रा को शब्‍दों में बांटने का प्रयास करुंगा -

स्‍लाइडशो की दुड़वा तस्‍वीरों की बजाए इत्‍मीनान से तस्‍वीरें देखना चाहें तो पूरी एल्‍बम नीचे है।

Ladakh 2011

Tuesday, August 10, 2010

विष्‍णु खरे हमारी ही बात कर रहे हैं

कॉलेज में एक आल्‍हादित साथी ने प्रसन्‍नमुख बताया कि आज विष्‍णु खरे ने जनसत्‍ता में खूब खरी खरी (खरी खोटी) सुनाई है हिन्‍दी के पाखंडियों को।  मैं तो सहम गया क्‍योंकि जब भी हिन्‍दी के पाखंडियों, हिन्‍दीखोरों, हिन्‍दी के दलालों आदि की बात होती है तो मैं सोचने लगता हूँ कि हम खुद को इस श्रेणी से किस आधार पर अलगा सकते हैं? अखबार पढ़ना कॉलेज से आने के बाद ही हो पाता है, इसलिए अपनी प्रतिक्रिया स्‍थगित रखी अब आकर पढ़ा ... छिनाल प्रकरण के बहाने विष्‍णु खरे हिन्‍दी अकादमिक व साहित्‍ियक जगत में फैले भ्रष्‍टाचार पर जमकर चोट कर रहे हैं, तथा ये केवल कालिया या राय का ही मसला नहीं है... इसमें कई मठाधीशों, ठुल्‍लों व दल्‍लों को पिटते देख मिलने वाला सैडिस्टिक प्‍लेज़र है सो अपनी जगह। किन्‍तु ऐसा नहीं कि हम खुद को इस पिटाई की ज़द से बाहर मान सकें मसलन क्‍या इन पंक्तियों में हमारा ही वर्णन नहीं हो रहा है -

अनेक हिंदी विभाग दरअसल ऐसी ही अक्षतयोनापुरुष-वेश्याओं के उत्पादक चकले बन गये हैं, जहां कायदे से कामायनीन पढ़ा कर कुट्टनीमतं काव्यंपढ़ाया जाना चाहिए। एक छोटा-मोटा दस्ता रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी युगों से ही उठ खड़ा हुआ था, फिर नंददुलारे वाजपेयी, शिवमंगल सिंह सुमन’, नगेंद्र आदि के उप-युगों से होता हुआ अब नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, मैनेजर पांडे, पुरुषोत्तम अग्रवाल से गुजरता हुआ सुधीश पचौरी और अजय तिवारी जैसे अकादेमिक बौने छुटभैयों तक एक अक्षौहिणी में बदल रहा है।

देश के अन्य विश्वविद्यालय केंद्रों की कैसी दुर्दशा होगी यह सहज ही समझा जा सकता है – वहां यही लोग तो ‘एक्सपर्ट’ बन कर अपने तृतीय से लेकर अंतिम श्रेणी के भक्तों को तैनात करते हैं।

खैर इस पर आप पूरी राय बना सकें इसलिए विष्‍णु खरे का यह लेख जनसत्‍ता तथा जगदीश्‍वरजी दोनों से साभार आपके सामने प्रस्‍तुत है...आने वाले कुछ दिन हिन्‍दी की दुनिया में इससे हल्‍ला रहने वाला है। तो पढ़ें -

साहित्य में प्रमाद -विष्णु खरे(1)


हममें से लगभग हर एक के साथ ऐसा होता है कि हम कुछ विचारों, वस्तुओं और व्यक्तियों को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते। ये पूर्वग्रह कभी सकारण होते हैं और कभी नितांत निरंकुश, जिनके लिए उर्दू में बुग्ज-ए-लिल्लाहीजैसा खूबसूरत पद है। हमें कुछ लोगों का जिक्र करने, उन्हें देखने, उनके साथ उठने-बैठने-फोटो खिंचाने, उन्हें अपने घर की दहलीज पर फटकने देने की कल्पना मात्र से घिन आने लगती है। यह खयाल भी हमारा इलाज नहीं कर पाता कि कुछ दूसरे हमजिंस हमारे बारे में भी ऐसा ही सोचते होंगे। बुग्ज की रौनक इसी में है।

छिनाल’-ख्याति के विभूति नारायण राय को ही लें। मेरे जानते उन्होंने मेरा कभी कुछ बिगाड़ा नहीं है। उलटे एक बार जब वे किसी वामपंथी सम्मेलन में जा रहे थे, जिसमें मैं भी आमंत्रित था पर अपनी जेब से यात्रा-व्यय नहीं देना चाहता था, तो आयोजक ने मुझसे कहा था कि राय प्रथम श्रेणी में आ रहे हैं और मुझे अपने साथ निष्कंटक मुफ्त में ला सकते हैं। फिर जब वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति हुए तो वर्धा के एक विराट लेखक-सम्मेलन में उन्होंने मुझे निमंत्रणीय समझा। अपने पूर्वग्रहों के कारण दोनों बार मैं उनके सान्निध्य से बचा।

उन्हें मैं कतई उल्लेखनीय लेखक नहीं मानता था और हाल ही में जब उनकी एक प्रेत-प्रेम कथा में यह पढ़ा कि अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास 1909 में आना शुरू हो चुके थे तो मेरी यह बदगुमानी पुख्ता हो गयी कि वे मात्र अपाठ्य नहीं, अपढ़ भी हैं। उनके आजीवन संस्थापन-संपादन में निकल रही एक पत्रिका उनके मामूली औसत मंझोलेपन का उन्नतोदर आईना है और उनके संरक्षण में उनके विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित की जा रही तीनों पत्रिकाएं अधिकांशत: नामाकूल संपादकों के जरिये हिंदी पर नाजिल हैं, हालांकि उनमें से एक में मेरी कुछ शंकास्पद कविताओं के अन्यत्र प्रकाशित शोचनीय अंग्रेजी अनुवाद दोबारा छपे हैं।

यह सोचना भ्रामक और गलत होगा कि जो ख्याति विभूति नारायण ने छिनालके इस्तेमाल से हासिल की है, वह नयी है। उनके वर्धा कुलपतित्व (पतितके साथ अगर श्लेष लगे तो वह अनभिप्रेत समझा जाए) के पहले भी उन्हें लेकर अनेक अनर्गल किंवदंतियां थीं जिनका संकेत भी देना भारतीय दंड संहिता की मानहानि-संबंधित धाराओं को आकृष्ट कर लेगा; हालांकि उन्हें लेकर मुद्रणेतर माध्यमों में जो कुछ कहा जा रहा है, उस पर अगर वे अदालत गये तो उन्हें अपना शेष जीवन वकीलों के चैंबरों के पास पोर्टा कैबिन सरीखे किसी ढांचे में रह कर बिताना होगा।

गनीमत यह है कि हिंदी लेखिकाओं के लिए उन्होंने छिनालशब्द कहा ही नहीं है, उसे छपवाया भी है, उस पर बावेला मचने पर लोकभाषाओं और असहाय प्रेमचंद के हवालों से उसके इस्तेमाल का बचाव किया है यानी उसे कबूल किया है और अंत में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय स्तर पर एक खेले-खाये नौकरशाह की तरह सरकारी यदिवादी मुआफी भी मांग ली है। अपने कायर मगर चालाक त्वचारक्षण में कपिल सिब्बल और विभूति नारायण की मिलीभगत कामयाब रही लाठी भी नहीं टूटी और शास्त्री भवन की इमारत खतरनाक, कुपित सर्पिणियों से खाली करवा ली गयी।

इसे क्या कहा जाए – ‘एंटी क्लाइमैक्स’, ‘इंटर्वल’, ‘हैपी एंडिंग’, ‘ट्रेजडी’, ‘फार्सया बेकेट-ग्रोतोव्स्की-प्रसादांत’? क्या यह मसला सिर्फ एक बदजुबान, बददिमाग कुलपति-निर्मित-आईपीएस की सार्वजनिक मौखिक-लिखित अशिष्टता का था, जिसे खुद को लेखक-बुद्धिजीवी समझने की खुशफहमी भी है, जिसकी नाबदानी फासिस्ट फूहड़ता को रफा-दफा और दाखिल-दफ्तर कर दिया गया है?

इस मामले को विभूति नारायण बनाम हिंदी लेखिकाएंमानना सिर्फ आंशिक रूप से सही होगा। हम इस अस्तित्ववादी बहस में यहां नहीं पड़ना चाहते कि तमाम महानतम विचारों, आस्थाओं और व्यक्तित्वों के बावजूद मानवता लगातार एक आत्महंता पतन का वरण ही क्यों करने पर अभिशप्त दीखती है, लेकिन यह एक कटु, निर्मम सत्य है कि समूचे भारत के सुकूत के बीच हिंदीभाषी समाज, उसकी संस्कृति(यों), हिंदी भाषा और साहित्य की उत्तरोत्तर अवनति और सड़न अब शायद दुर्निवार और लाइलाज है बल्कि यह तक कहा जा सकता है कि दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिंदीभाषी समाज, यानी तथाकथित हिंदी बुद्धिजीवी, जिम्मेदार और कुसूरवार हैं।

प्राइमरी स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक, रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, मुद्रित समाचार जगत, अकादेमियां, प्रकाशक, पुस्तकखरीद संस्थाएं, संस्कृति संसार, केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के मंत्रालय और विभाग, विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका जहां भी हिंदी में या हिंदी का काम हो या नहीं हो रहा है, वहां के सारे हिंदी-उत्तरदायी इसके अपराधी हैं। हिंदीभाषी निम्न-उच्च और मध्यवर्ग भी इसके लिए कम दोषी नहीं।

यह मैं मानता हूं कि सर्जनात्मक साहित्य में कभी-कभी कथित अश्लील भाषा और चित्रण के बगैर लेखक का काम चल नहीं सकता, हालांकि उनके बिना भी सार्थक साहित्य लिखा ही जा रहा है। लेकिन गैर-रचनात्मक लेखन में लेखक को उससे बचना चाहिए, विशेषत: जब वह किन्हीं व्यक्तियों और समूहों को लेकर अपनी कोई धारणा व्यक्त कर रहा हो।

यह सही है कि विभूति नारायण ने अपना अधिकांश कार्यकाल एक ऐसे महकमे में काटा है जिसमें अश्लीलतम गालियां देना और सुनना पेशे का अनिवार्य और स्पृहणीय अंग है। लेकिन अगर एक ओर आपको यह भ्रम हो कि आप एक वाम समर्थक-समर्थित लेखक हैं देखिए कि जन संस्कृति मंच ने उन्हें लेकर कैसे दो परस्पर-विरोधी जैसे बयान जारी किये हैं, जिनमें से एक को जाली बताया गया था और दूसरी ओर गांधीजी (जिनके दुर्भाग्य का पारावार नजर नहीं आता) के नाम पर खोले गये हिंदी भाषा और साहित्य के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति, तो आपको हिंदी को लेकर बा मुहम्मद होशियारजैसा लौह-नियम जागते-सोते याद रखना चाहिए।

लेकिन, ‘जिन्हें देवता बर्बाद करना चाहते हैं पहले उन्हें विकल मस्तिष्क कर देते हैंवाली यूनानी कहावत के मुताबिक हमारे कुलपति का दिमाग लेखक होने के उनके वहम और वामपंथियों के अपनी वर्दी की कई जेबों में होने की खुशफहमी ने तो खराब कर ही दिया होगा, हिंदी कुलपति होने की सत्ता के कारण राष्ट्रव्यापी अधिकांश हिंदी प्राध्यापक-लेखक-प्रकाशक गुलामी जो उन्हें अनायास प्राप्त हो गयी उसने उन्हें विभूति-विभ्रम (डिल्यूजंस ऑफ ग्रैंड्योर’) का आखेट बना डाला। हम अधिकांश हिंदी विभागों की गलाजतों को जानते ही हैं। स्वयं गांधी विश्वविद्यालय में सैकड़ों पद और छात्रवृत्तियां हैं, एमलिट, एमफिल, पीएचडी के निबंध-प्रबंध हैं, अपने अपने रुझान के उपयुक्त छात्र-छात्राएं हैं, लेखक-लेखिकाओं को बुलाने के लिए सारे बहाने और बहकावे-बहलावे हैं।

आप एक्सपर्टबन कर किस-किस को कहां-कहां कैसे-कैसे सेलेक्ट और रिजेक्ट नहीं कर सकते। प्रकाशक-मुद्रक-संपादक-कागज व्यापारी आपके बूट चूमने लगते हैं। हिंदी की सारी दुनिया आपके लोलुप लोचनों में छिनाल से कम नहीं रह जाती। हिंदी का प्राय: हर व्याख्याता, रीडर या प्रोफेसर इन्हीं फंतासियों में जीता है और उन्हें चरितार्थ करने में सक्रिय रहता है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अब जो कल्पनातीत और अधिकांशत: अपात्र वेतनमान लागू हैं, उनके कारण प्राध्यापक वर्ग में हिंदी के शुद्ध मसिजीवी लेखकों के प्रति हिकारत और बढ़ गयी है। सभी जानते हैं कि हिंदी विभागों में कई दशकों से यौन-शोषण चल रहा है, जो अक्सर दबा-छिपा दिया जाता है।

हम यह न भूलें कि ऐसे लोगों ने वे भी पाल रखे हैं, जिन्हें लीलाधर जगूड़ी के एक पुराने मुहावरे में पुरुष-वेश्याही कहा जा सकता है। अनेक हिंदी विभाग दरअसल ऐसी ही अक्षतयोनापुरुष-वेश्याओं के उत्पादक चकले बन गये हैं, जहां कायदे से कामायनीन पढ़ा कर कुट्टनीमतं काव्यंपढ़ाया जाना चाहिए। एक छोटा-मोटा दस्ता रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी युगों से ही उठ खड़ा हुआ था, फिर नंददुलारे वाजपेयी, शिवमंगल सिंह सुमन’, नगेंद्र आदि के उप-युगों से होता हुआ अब नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, मैनेजर पांडे, पुरुषोत्तम अग्रवाल से गुजरता हुआ सुधीश पचौरी और अजय तिवारी जैसे अकादेमिक बौने छुटभैयों तक एक अक्षौहिणी में बदल रहा है।

देश के अन्य विश्वविद्यालय केंद्रों की कैसी दुर्दशा होगी यह सहज ही समझा जा सकता है वहां यही लोग तो एक्सपर्टबन कर अपने तृतीय से लेकर अंतिम श्रेणी के भक्तों को तैनात करते हैं। अल्लाह ही बेहतर जानता है कि सूडो-नामवर सिंह होने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाला एक हिंदी प्रोफेसर केंद्रीय सेवाओं के कूड़ेदान के लिए किस कचरे का योगदान कर रहा होगा। हिंदी की साहित्यिक संस्कृति का एक अनूठा आयाम यह भी है कि प्राय: सभी लेखक और प्रकाशक आपस में मित्र या शत्रु हैं, इन दोस्तियों और दुश्मनियों में भले ही बराबरियां न हों, ये संबंध अकादमिक दुनिया तक भी पहुंचते हैं और लगातार बदलते रहते हैं। इनमें एक वर्णाश्रम धर्म और वर्ग विभाजन भी है, नवधा-भक्तियां हैं, संरक्षकत्व, अभिभावकत्व, मुसाहिबी, चापलूसी, दासता आदि जटिल तत्त्व शामिल हैं। इसमें छोटी-बड़ी पत्रिकाओं के संपादकों की भूमिकाएं भी हैं, मगर बड़ी पत्रिकाओं के प्रकाशकों संपादकों के पास अधिक सत्ता है।

यह इसलिए है कि यों तो अपना नाम और फोटो छपा देखने की आकांक्षा पिछले साठ वर्षों से ही देखी जा रही है, पर लेखकों में फिर भी कुछ हया, आत्मसम्मान और स्व-मूल्यांकन के जज्बात बाकी थे। दुर्भाग्यवश अब पिछले शायद दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महत्त्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुड़ुकलुल्लू-मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढ़ी नमूदार हुई है, जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है। अकविता आंदोलनके बाद साहित्यिक मूल्यों का ऐसा पतन सिर्फ इधर की कहानी और कविता दोनों में देखा जा रहा है। पत्रिका-जगत में ऐसे सरगनाओं जैसे संपादकों का वर्चस्व है, जो अपने-अपने लेखक-गिरोह तैयार करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद के इक्कीसवीं सदी के संस्करणों का निर्लज्ज इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रतिभाशाली, संयमी, विवेकवान और साहसी युवा, प्रौढ़ और वरिष्ठ लेखक-लेखिकाएं बचे ही नहीं, मगर ग्रेशम के नियम के साहित्यिक संस्करण में खोटे सिक्कों ने वास्तविकों को बचाव-मुद्रा में ला दिया है जो अंतत: श्रेयस्कर ही है।

विभूति नारायण का छिनाल-प्रकरण अकादमिक-लेखकीय-संपादकीय मिलीभगत (नैक्सस’) के बिना संभव न होता। नया ज्ञानोदयके संपादक रवींद्र कालिया विभूति नारायण से कम मीडिऑकर लेखक हैं या अधिक, यह बहस का मसला नहीं है, लेकिन दोनों मिल कर एक अनैतिक साहित्यिक-सत्ता का प्रदर्शन करना चाहते थे। ज्ञानोदयदरअसल कितना छपता है इसका कुछ अंदाज हमें है; लेकिन बेशक कालिया ने उसमें और ज्ञानपीठ प्रकाशन में अपनी वल्गरप्रतिभा से कुछ अस्थायी प्राण जरूर फूंके हैं। हम यह भी जानते हैं कि ज्ञानपीठ का प्रबंधन मूलत: राजनीतिक हवामुर्ग रहा है। कालिया अपने कांग्रेसी रिश्तों की वजह से ज्ञानपीठ में हैं, यह न तो ठीक-ठीक जाना जा सकता है और न उसकी जरूरत है।

मुझे शांतिप्रसाद-रमा जैन और लक्ष्मीचंद्र जैन के युग का ज्ञानोदय और ज्ञानपीठ याद हैं वर्तमान निजाम को उसकी शर्मनाक अवनति ही कहा जा सकता है। लेकिन हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का उत्थान और पतन मुंबई के धर्मयुगऔर सारिकासे होता हुआ नया ज्ञानोदय तक देखा जा सकता है। कुछ संपादकों ने मुख्यत: कहानी को स्त्रियों का शिकार करने की विधा में बदल दिया और रवींद्र कालिया उसी परंपरा की सड़ांध-भरी तलछट हैं। उन्हें दो बड़ी सुविधाएं हैं; उनके पास एक पत्रिका है, एक प्रकाशन-गृह है जिनके प्रबंधक साहित्य को सिर्फ बिक्री के तराजू में तौलना जानते हैं और उन्हें एक ऐसा लेखक-समाज मिला है जो अधिकांशत: किसी भी नैतिक कीमत पर सिर्फ छपना चाहता है।

साहित्यिक पत्रकारिता में बाजारवाद ‘धर्मयुग-सारिका’ से शुरू हुआ था जो अब अन्य पत्रिकाओं के अलावा ‘ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ’ में पूर्ण-कुसुमित महारोग का विकराल रूप ले चुका है। अपनी सत्ता और सफलता से राय-कालिया गठबंधन इतना प्रमादग्रस्त हो गया था कि उसने सोचा कि वह हिंदी समाज में ‘छिनाल’ को भी निगलवा लेगा, पर वह उसके गले की हड्डी बन गया। (क्रमशः)